Monday, February 17, 2020
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देश में विरोध के नाम पर फैलाई जा रही हिंसा के लिए यहां से हो रही है फंडिंग

नई दिल्ली: नागरिकता कानून (CAA) को लेकर हो रहे प्रदर्शनों में आपने देखा है कि कैसे पूरे देश में विरोध के नाम पर टुकड़े टुकड़े गैंग का एजेंडा चलाया जा रहा है. ये कानून देश की संसद से पास हो चुका है. इस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हो चुके हैं और सुप्रीम कोर्ट इस पर रोक लगाने से इनकार कर चुका है. तो आप सोचिए कि फिर भी इन विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला रुक क्यों नहीं रहा. ऐसा इसलिए नहीं हो रहा क्योंकि इन विरोध प्रदर्शनों की आड़ में एक बड़ा सच छिपाया जा रहा है. वो सच ये है कि ये विरोध प्रदर्शन लोग अपनी मर्ज़ी से और सिर्फ अपने दम पर नहीं कर रहे. बल्कि ये एक सोची समझी साजिश का हिस्सा है.

प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) यानी ईडी के मुताबिक इन विरोध प्रदर्शनों को कई संगठनों के द्वारा फंडिंग की जा रही है. ईडी की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस कानून के विरोध में हुई हिंसा के पीछे पीएफआई यानी पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया का हाथ था. सूत्रों से पता चला है कि हिंसा भड़काने के लिए पीएफआई ने फंडिंग की थी. और अकेले शाहीन बाग में पीएफआई के 5 दफ्तर भी हैं.

राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए के मुताबिक 1992 में अयोध्या का विवादास्पद ढांचा टूटने के बाद 1993 में केरल में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट का गठन हुआ था, जिसका नाम वर्ष 2006 में पीएफआई यानी पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया हो गया. पहली बार ये संघटन 2010 में तब चर्चा में आया, जब इस पर केरल में एक प्रोफेसर का हाथ काटने का आरोप लगा. पीएफआई पर केरल में जबरदस्ती धर्मांतरण के बाद निकाह कराने के भी आरोप है.

आरोप है कि इस संगठन को सऊदी अरब जैसे मुस्लिम देशों से फंड मिलता है . एनआईए के मुताबिक पीएफआई के संबंध प्रतिबंधित प्रतिबंधित संगठन SIMI से भी हैं. पिछले साल पीएफआई पर झारखंड सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था. आरोप था कि इसके संबंध आतंकवादी संगठन आईएसआईएस से हैं. हमें ये भी पता चला है कि शाहीन बाग़ में पीएफआई और उससे जुड़े संगठनों के 5 दफ्तर हैं. कल हमने जब शाहीन बाग में उन दफ्तरों तक पहुंचने की कोशिश की तो हमें रोक दिया गया था.

थोड़ी देर पहले हमने आपको बताया कि शाहीन बाग़ जैसे विरोध प्रदर्शन दिल्ली के कई इलाकों में हो रहे हैं. और आप इनमें से किसी भी इलाके में जाने की हिम्मत नहीं कर सकते. क्योंकि इन इलाकों में सिर्फ एक खास विचारधारा के लोगों को ही आने दिया जा रहा है. ऐसा ही एक इलाका है निजामुद्दीन जहां पीएफआई से जुड़े संगठन SDPI यानी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया का दफ्तर है.

जब हम यहां पहुंचे तो हमें SDPI एक अधिकारी मिले जिन्होंने ईडी की जांच में नाम आने के सवाल पर साफ कहा कि उनके संगठन का पीएफआई से संबंध है. क्योंकि दोनों का नज़रिया एक जैसा है. देश को लेकर पीएफआई का नज़रिया कैसा है. ये आप देख ही चुके हैं. ईडी की रिपोर्ट में नेशनल कन्फेड्रेशन ऑफ ह्यूमन राइट ऑर्गेनाइजेशन यानी NCHRO का भी जिक्र है.

जब हमारी टीम इस संगठन के दफ्तर पहुंची तो वहां हमे कोई अधिकारी तो नहीं मिला. लेकिन कुछ आपत्तिजनक पोस्टर्स ज़रूर दिखाई दिए. इनमें से कुछ पोस्टर्स पर भारत को रिपब्लिक ऑफ लिंचिस्तान कहा गया था. जबकि बाकी के पोस्टर्स में नए नागरिकता कानून और नागरिकता रजिस्टर के विरोध में बातें लिखी हुई थी. हमने NCHRO के एक अधिकारी से जब इस बारे में फोन पर बात की तो उन्होंने भी इन सभी आरोपों से इनकार कर दिया.

इसके अलावा हम जंगपुरा में मौजूद रिहाब इंडिया फाउंडेशन यानी RFI के दफ्तर भी पहुंचे. इस संगठन का नाम भी ईडी की रिपोर्ट में प्रमुखता से लिया गया है. ईडी की रिपोर्ट के मुताबिक RFI ने पीएफआई के साथ लाखों रुपये का लेन-देन किया था. लेकिन अब RFI ने भी इन विरोध प्रदर्शनों से किसी तरह के कनेक्शन से इनकार किया है.

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