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उरी- द सर्जिकल स्ट्राइक रिव्यू : देशभक्ति, राष्ट्रवाद को और मजबूत करता फिल्म, भारत के अंदर छुपे देशद्रोहियो के मुंह पर करारा तमाचा है!

डायरेक्टर: आदित्य धर
स्टार कास्ट: विक्की कौशल, यामी गौतम, परेश रावल, मोहित रैना
रेटिंग – ⭐️⭐️⭐️⭐️

उरी सैन्य कैम्प पर आतंकी हमले के बाद हमारी नशें गुस्से से तमतमा गई थी। उरी – द सर्जिकल स्ट्राइक को देखते वक़्त भी हमारी नशें रोमांच से तमतमा जाती है।

सितम्बर 2016 में उरी में सेना के कैम्प पर हमले के बाद सेना ने बदला लेने के लिए पाक अधिकृत कश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया था। ये एक कॉन्फिडेंशियल मिशन था जिसके बारे में हर बात गुप्त थी, ऐसे में एक ऐसी फिल्म बनाना जिसके बारे में ज्यादा दस्तावेज उपलब्ध न हो, काफी मुश्किल काम है। जरा सी चुक होने पर फिल्म के ओवर ड्रामेटिक और बर्बाद होने का खतरा था लेकिन आदित्य धार ने अपनी पहली फिल्म होने के बावजूद फिल्म को ऐसे संभाला कि हर गोली के साथ आपके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। आपको याद रह जाते हैं कैप्टन विहान सिंह शेरगिल के रोल में विक्की कौशल।

कहानी – फिल्म की कहानी शुरू होती है भारत -म्यांमार सीमा पर पूर्वोत्तर के आतंकियों द्वारा जंगल से गुजर रहे सेना के एक काफिले पर हमला करने से। पहली सीन में ही घने जंगलों में गोलियों की तड़तड़ाहट कानों को सुन्न सी कर देती है और आप सीट से चिपक जाते हैं। इस आतंकी हमला का बदला लेने के लिए भारत -म्यांमार बॉर्डर पर विहान सिंह शेरगिल के नेतृत्व में एक सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया जाता है और पूर्वोत्तर के आतंकियों को मौत के घाट उतार बदला लिया जाता है।

उसके बाद कहानी दिल्ली आती है, जहाँ विहान सिंह शेरगिल और करण कश्यप (मोहित रैना) के परिवार के साथ छोटे छोटे हंसी ख़ुशी के पल बिताते है और साथ ही साथ पंजाब और जम्मू के कई जगहों पर छोटे छोटे आतंकी हमलों की कहानी साथ साथ चलती है। ये सारे छोटे छोटे आतंकी हमले को सरकार और इंटेलिजेंस एजेंसियां सुलझाने की कोशिश में होती है कि तभी उरी में सेना के कैम्प पर सोते हुए सैनिकों पर आतंकी गोलियों की बौछार कर देते हैं। कैम्प पर आतंकी हमले में मेजर करण कश्यप शहीद हो जाते हैं।

इस हमले के बाद देश में गुस्से का माहौल होता है और सरकार भी इस हमले का करारा जवाब देना चाहती है। ऐसे में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार गोविन्द (परेश रावल) सर्जिकल स्ट्राइक का सुझाव देते हैं और फिर शुरू होती है इसके लिए प्लानिंग और टीम का गठन। इसके बाद सर्जिकल स्ट्राइक के तनाव को महसूस करने के लिए आपको फिल्म देखना पड़ेगा।

स्क्रीनप्ले : एक ऐसे विषय पर फिल्म बनाना जिसके बारे में सिर्फ सुना गया हो, फिल्म के देशभक्ति के सेंटिमेंट में उलझ जाने और भावनाओं में बह जाने का खतरा होता है। लेकिन फिल्म में ऐसा कुछ नहीं होता। फिल्म का स्क्रीनप्ले इतनी बारीकी से और इतने कसावट के साथ लिखा गया है कि सर्जिकल स्ट्राइक की प्लानिंग और सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान तनाव आपने चेहरे पर होता है और आप सीट से चिपके हुए पाते हैं खुद को।

फिल्म बेवजह के देशभक्ति गानों और पारिवारिक सेंटिमेंट में उलझ कर लम्बी नहीं होती बल्कि अपने मुख्य फोकस को पकडे रहती है।

फिल्म में पुरे ऑपरेशन की प्लानिंग, इम्प्लीमेंटेशन सब कुछ इतनी परफेक्ट तरीके से दिखाया जाता है कि आप मुंह बाए सबकुछ देखते रहते हैं। मिलिट्री ऑपरेशन अँधेरे में फिल्माया गया है जिसकी वजह से बिलकुल रियल फील आता है। भारतीय सेना को हॉलीवुड फिल्मों की टक्कर का दिखाया गया है। फिल्म देखते हुए आप कई बार अपनी सीट पर उछल जाने को मजबूर हो जाते हैं। उरी में शहीद हुए गोरखा रेजिमेंट के कर्नल एम एन रॉय के पार्थिव शरीर के पास उनकी बेटी को वार क्राई करते हमने न्यूज चैनलों पर देखा था और वो सीन फिल्म में देख कर आँखे नम हो जाती है।

एक्टिंग – विक्की कौशल के बारे में कहने के लिए मुझे नहीं लगता है कोई शब्द है मेरे पास। उनकी तारीफ़ के लिए अलग डिक्शनरी लिखनी पड़ेगी। बोलने से लेकर चलने तक परफेक्ट आर्मी मैन का किरदार वो निभाते नहीं बल्कि जीते हैं। उनके लिए थियेटर में बजती सीटियाँ ही उनकी काबिलियत की गवाही देता है। फिल्म में मोहित रैना कर्नल करण कश्यप के किरदार में शानदार है। उन्हें थोडा और स्क्रीन स्पेस मिलना चाहिए था। उरी सेना कैम्प पर हमले वाले सीन में वो छा जाते हैं।

अजीत डोवाल से मिलते जुलते कैरेक्टर में परेश रावल शानदार है। सपोर्टिंग कैरेक्टर का जिक्र न करना फिल्म के साथ नाइंसाफी होगी। इंटेलिजेंस ऑफिसर के रोल में यामी गौतम लाजवाब हैं। मोदी जी के रोल में रजित कपूर को देख चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।

कमजोरी – फिल्म में थोड़ी फ़िल्मी स्वंत्रता ली गई है और ये कुछ ज्यादा ही बचकाना लगता है। इतने बड़े मिशन को एक दिन में तैयार किये गए गरूड ड्रोन की मदद के भरोसे ऑपरेट करते हुए दिखाना काफी खलता है। और वो गरुड़ ड्रोन भी बाईचांस मिलना … ये तो हद है। परेश रावल का बार बार मोबाईल तोडना गले से नहीं उतरता। लेकिन इन कमजोरियों को इग्नोर किया जा सकता है।

और अंत में, ये फिल्म आज के वक़्त की जरूरत है। इस तरफ की फिल्मे बनती रहनी चाहिए। इस फिल्म को मिस नहीं किया जा सकता और हाँ इस फिल्म के लिए थियेटर में बजती तालियाँ और सीटियाँ जहरीला राष्ट्रवाद बताने वालों के मुंह पर करारा तमाचा है।

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