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अयोध्या में मंदिर होने के पर्याप्त सबूत, जमीन हिन्दुओं को सौंप देनी चाहिए – केके मोहम्मद

सुप्रीम कोर्ट अयोध्या मामले की लगातार सुनवाई रहा है और उम्मीद है कि 17 नवंबर तक फैसला भी आ जाएगा। इसी बीच आर्कियॉलजिस्ट केके मोहम्मद ने कहा है कि आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) के पास इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि बाबरी मस्जिद से पहले वहां एक मंदिर था। बता दें कि मोहम्मद नॉर्थ एएसआई के आंचलिक निदेशक रह चुके हैं और 1976-77 में मंदिर-मस्जिद मामले में हुई जांच के समय वह टीम का हिस्सा थे।

मोहम्मद ने हमारे सहयोगी टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि क्यों मुस्लिमों को अपनी इच्छा से अयोध्या की विवादित भूमि सौंप देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि विवादित बाबरी मस्जिद के नीचे मिले सबूतों से पता चलता है कि वहां एक बड़ा मंदिर था। उन्होंने बताया, ‘1976-77 में बीबी लाल की अगुआई में पहली बार उत्खनन किया गया। मुझे याद है कि मैं अकेला ही मुसलमान उस टीम में था।’ उन्होंने बताया कि यह खुदाई तब हुई थी जब इतिहासकार सैयद नुरुल हसन सांस्कृतिक मामलों के केंद्रीय मंत्री थे।

पहली खुदाई में मिले 12 स्तंभ
मोहम्मद ने बताया, ‘पूरा इलाका पुलिस के कब्जे में था और आम लोगों को जाने की इजाजत नहीं थी। हमने देखा कि मस्जिद के 12 स्तंभ ऐसे थे जो कि मंदिर के अवशेष थे।’ ये पिलर मंदिर के ही थे इस मामले में तर्क देते हुए मोहम्मद ने कहा, ’12वीं और 13वीं शताब्दी के अधिकतर मंदिरों के स्तंभों में आधार पूर्ण कलश के जैसा होता था जो कि हिंदू धर्म में समृद्धि का प्रतीक है। इसे अष्ट मंगल चिह्न के रूप में जाना जाता है जो कि आठ पवित्र चिह्नों में से एक है।’

मंदिरों को तोड़कर बनी थी यह भी मस्जिद
उन्होंने कहा कि कुतुब मीनार के पास कुवातुल इस्लाम मस्जिद भी 27 मंदिरों को तोड़कर बनाई गई थी। ताज-उल-मसीर नाम की किताब में इतिहासकार हसन निजामी ने इसके प्रमाण भी दिए हैं। उन्होंने लिखा है कि मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। कुवातुल मस्जिद में भी पूर्ण कलश मिले थे और देवी-देवताओं की मूर्तियां मिली थीं। ऐसा ही मामला बाबरी मस्जिद का भी है। ‘वहां देवी-देवताओं की मूर्तियां नहीं मिलीं लेकिन अष्ट मंगल चिह्न मिले। ऐसे में कोई भी पुरातत्ववेत्ता कहेगा कि वे मंदिर के अवशेष थे।’

खुदाई में मिलीं मूर्तियां
उन्होंने कहा कि मस्जिद के पश्चिमी हिस्से में जब खुदाई की गई तो कई टेराकोटा मिले जो कि मानवों और जानवरों की आकृतियां थीं। मोहम्मद ने कहा कि मस्जिद में ऐसी आकृतियां नहीं हो सकती क्योंकि इन्हें इस्लाम में ‘हराम’ बताया गया है। उन्होंने कहा कि बीबी लाल ने इन बातों को हाइलाइट नहीं किया क्योंकि जांच का उद्देश्य यह बताना नहीं था कि वहां मंदिर था या नहीं बल्कि उस जगह के सांस्कृतिक विकास को जानना था।

‘कई इतिहासकारों ने किए झूठे दावे’
केके मोहम्मद ने कहा कि 1990 के आसपास उस जगह पर रोमिला थापर, डीएन झा और आरएस शर्मा जैसे इतिहासकार पहुंचे और उन्होंने दावा किया कि मंदिर का कोई अवशेष नहीं पाया गया जो कि सरासर झूठ था। यह भी कहा गया कि रिपोर्ट में मंदिर का कोई जिक्र नहीं है। बीबी लाल ने स्पष्ट किया कि उन्हें बड़ी संख्या में मंदिर के अवशेष मिले लेकिन उन्हें मुद्दा नहीं बनाया गया।

मक्का, मदीना की तरह अयोध्याः मोहम्मद
मोहम्मद ने कहा कि उन्होंने अखबारों को दिए इंटरव्यू में कहा था कि यह स्थान हिंदुओं के लिए मक्का और मदीना की तरह है इसलिए इसे खुशी से हैंड ओवर कर देना चाहिए। उन्होंने बताया कि दूसरी बार 2003 में खुदाई हुई लेकिन तब तक मस्जिद गिराई जा चुकी थी इसलिए ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार सर्वे किया गया। इसमें भी पता चला कि बाबरी मस्जिद के नीचे भी कई स्ट्रक्चर थे। यह खुदाई हरी मांझी और बीआर मणि की देखरेख में की गई थी। उन्होंने बताया कि दूसरी बार की खुदाई में 90 स्तंभ मिले। इसका मतलब है कि मस्जिद से पहले का स्ट्रक्चर काफी बड़ा था।

उन्होंने कहा कि दूसरी बार की खुदाई में घड़ियाल के आकार की प्रणाली (जलाभिषेक के बाद पानी बहाने वाला स्ट्रक्चर) पाई गई। उन्होंने कहा कि इस खुदाई में टेराकोटा के लगभग 263 टुकड़े मिले जो कि अलग-अलग देवी देवताओं की मूर्तियों के थे। उन्होंने कहा कि मस्जिद में जीवित प्राणियों के चित्र नहीं बनाए जा सकते तो यह मस्जिद कैसे हो सकती है?

Source: Navbharat Times

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