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नेहरू ने नहीं बनवाया था AIIMS बल्कि उन्होंने तो फण्ड का हवाला देकर मुँह मोड़ लिया था

नई दिल्ली। जिस एम्स को बनवाने का श्रेय कांग्रेसी लेते हैं असल में उसे कपूरथला की राजकुमारी अमृत कौर ने बनवाया था। आजकल हर कांग्रेसी यह जरूर कहता है कि एम्स तो नेहरू ने बनवाया था। जब भी अमित शाह एम्स में या बीजेपी का कोई नेता एम्स में भर्ती होता है तब कांग्रेसी यह तंज जरूर करते हैं कि नेहरू के बनवाए अस्पताल में भर्ती हुए जबकि सच्चाई कुछ और है। एम्स की स्थापना में नेहरू का कोई भी योगदान नहीं था। एम्स राजकुमारी अमृत कौर अहलूवालिया ने बनवाई थी जो कपूरथला राज परिवार से थीं।

शाही परिवार से ताल्लुक रखने वाली राजकुमारी अमृत कौर का जन्म 2 फरवरी 1889 को लखनऊ में हुआ था। वह पंजाब के कपूरथला के राजा सर हरनाम सिंह की बेटी थीं। वो देश की पहली केंद्रीय मंत्री बनीं और 1947 से लेकर 1957 तक दस साल तक स्वास्थ्य मंत्री रहीं। अपने जीवन में कई सफलताएं हासिल करने के बाद 2 अक्टूबर 1964 को दिल्ली में उनका निधन हो गया।

देश की आजादी के बाद यह भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री बनी थीं। इन्होंने जब नेहरू के सामने एक ऐसा हॉस्पिटल बनाने का प्रस्ताव रखा जो बेहद बेजोड़ हो तब नेहरू ने फंड की कमी का हवाला देकर मना कर दिया था।

अमृत कौर ने बेहतर स्वास्थ्य सेवा के लिए नई दिल्ली में एम्स की स्थापना कि और अहम भूमिका निभाई। इसके लिए उन्होंने जर्मनी और न्यूजीलैंड से आर्थिक मदद भी ली थी। एम्‍स की आधारशिला साल 1952 में रखी गई और एम्‍स का सृजन 1956 में संसद के एक अधिनियम के जरिये स्‍वायत्त संस्‍थान के रूप में किया गया था। वह एम्स की पहली महिला अध्यक्ष बनाई गई थी। उन्होंने शिमला में अपनी पैतृक संपत्ति और घर को संस्थान और कर्मचारियों के लिए दान कर दिया था।

साल 1950 में उन्हें विश्व स्वास्थ्य संगठन का अध्यक्ष बनाया गया। यह सम्मान हासिल करने वाली वह पहली महिला और एशियाई थी। उन्हें खेलों से भी काफी लगाव था। नेशनल स्पोर्ट्स क्लब ऑफ इंडिया की स्थापना भी अमृत कौर ने की थी और इस क्लब की वह शुरू से ही अध्यक्ष भी रहीं। उनको टेनिस खेलने का बड़ा शौक था और उन्होंने इसमें कई चैंपियनशिप भी जीती थी।

गांधीवादी हो गई थी राजकुमारी: राजकुमारी अमृत कौर केंद्रीय मंत्री बनने वाली आजाद भारत की पहली महिला थीं। अमृत कौर महात्मा गांधी के बेहद करीब थीं। विदेश में पढ़ाई करने के बाद स्वदेश लौटने पर वह स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गईं। महात्मा गांधी से 1934 में मुलाकात होने के बाद वह पूरी तरह से गांधीवादी विचारधारा पर चलने लगी थीं।